Hindi translation of the resolution on the two day general strike, to be held on 08th & 09th January, 2019.
बीएसएनएल ईयू की गाज़ियाबाद में सम्पन्न सीईसी में 8 और 9 जनवरी 2019 की आम हड़ताल को ले कर प्रस्ताव पारित
नई दिल्ली में 28.09.2018 को सम्पन्न मजदूर कर्मचारियों के राष्ट्रीय सम्मेलन ( नेशनल कन्वेंशन ऑफ वर्कर्स ) ने समस्त वर्किंग क्लास को 8 और 9 जनवरी 2019 की आम हड़ताल में शामिल होने का आव्हान किया है।
नरसिम्हा राव-मनमोहन सिंह द्वय द्वारा 1991 में शुरू की गई नव उदारवादी नीतियों को लागू हुए लगभग 27 वर्ष हो चुके हैं। तत्पश्चात, सत्तासीन होने वाली समस्त सरकारों ने इन नीतियों को बहुत ही सावधानी पूर्वक तरीके से जारी रखा है। इस दौरान, साल दर साल भारतीय और बहुराष्ट्रीय कॉर्पोरेट्स को बड़ी बड़ी रियायतें (कन्सेशन्स) दी गई। इसके साथ ही, कमजोर तबकों को खाद्यान, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं में दी जा रही सब्सिडी में लगातार कटौती की गई। इसीलिए हम नव उदारवादी नीतियों को अमिरोन्मुखी (प्रो-रिच) व गरीब विरोधी (एन्टी-पुअर) नीतियां कहते हैं।
बड़े कॉर्पोरेट्स को पब्लिक सेक्टर बैंक्स में आम जनता की जमा राशि की लूट की छूट दी गई है। कॉर्पोरेट्स द्वारा ऋण के रूप में लिए गए करोड़ों रुपए लौटाए नही गए हैं। सरकार द्वारा इस राशि की वसूली हेतु कड़ी कार्यवाही करने की बजाय इसे डूबत कर्ज (बैड लोन) निरूपित कर समय समय पर ऋण माफ किया जा रहा है। इस तरह, अपने नीतिगत निर्णयों के तहत, आनेवाली सरकारों ने कॉर्पोरेट्स के लिए जनता की जमा पूंजी की लूट का मार्ग प्रशस्त किया है और दूसरी ओर पब्लिक सेक्टर बैंक्स को बीमार निकायों में तब्दील किया जा रहा है।
सरकार की गलत नीतियों की वजह से कृषि क्षेत्र भी बड़े संकट में है। सरकार के अपने आंकड़ों के अनुसार 1995 से 2014 के मध्य 2, 96, 438 किसान आत्महत्या कर चुके हैं। यह बेहद व्यथित करने वाली स्थिति है। प्रत्येक सरकार ने कृषि क्षेत्र की उपेक्षा की है। कर्ज का बोझ, मानसून की बेरुखी, सरकार द्वारा लागत मूल्य भुगतान सुनिश्चित न करना आदि इस दुखद स्थिति के कारण है। वर्तमान सरकार भी इन मुद्दों की ओर निरंतर रूप से आंख मूंदे हुए है।
विगत 27 वर्षों में नव उदारवादी नीतियों को लागू करने की वजह से देश में व्यापक रूप से असमानता की स्थिति निर्मित हुई है। एक ओर देश के अलग अलग हिस्सों से भुखमरी से हुई मौतों की खबरें प्राप्त हो रही है, वहीं दूसरी ओर चंद मुट्ठी भर लोगों के हाथों में विशाल संपदा का संचयन है। ऑक्सफेम की रिपोर्ट के अनुसार 2017 में अर्जित 73% संपदा जनसंख्या के 1% उच्च वर्ग ने हासिल की है। जबकि निचले तबके के 67 करोड़ भारतीयों को इसका केवल 1% हिस्सा ही मिल पाया है। इसी प्रकार फ्रेंच टेक फर्म कैपगेमिनी के अनुसार 2017 में "हाई नेटवर्थ इंडिविज्यूअल्स (HNI)" की संख्या में 20% का इजाफ़ा हुआ है। HNI वह शख्स है जिसके पास एक मिलियन से अधिक विनिवेश योग्य संपत्ति (investible assets) है।
मोदी सरकार, जिसके पास लोकसभा में पूर्ण बहुमत है, ने पब्लिक सेक्टर पर अप्रत्याशित हमले किए हैं। भारतीय रेलवे और सुरक्षा उपकरणों का उत्पाद करने वाली पब्लिक सेक्टर फैक्ट्रीज भी निजीकरण की समस्या से जूझ रही है। सरकार ने 2017-18 में विनिवेश के रूप में 1 लाख करोड़ रुपए प्राप्त किए हैं जबकि विनिवेश का लक्ष्य रु 75,000 करोड़ ही था। यह नरेंद्र मोदी सरकार की सार्वजनिक उपक्रम विरोधी नीतियों के बारे में बताने के लिए पर्याप्त है।
रिलायंस जियो द्वारा प्रीडेटरी प्राइसिंग ( लागत से कम मूल्य) अपनाने की वजह से दूरसंचार उद्योग संकट के दौर से गुजर रहा है। मोदी सरकार मुकेश अम्बानी के स्वामित्व की रिलायंस जिओ को सम्पूर्ण रूप से बेझिझक हर संभव सहयोग कर रही है। इसका अनुपम उदाहरण है श्री जे एस दीपक, सेक्रेटरी डॉट की अनौपचारिक ढंग से डॉट से रवानगी, वह भी केवल इसलिए कि उन्होंने रिलायंस जियो की प्रिडेटरी प्राइसिंग का विरोध किया था। साथ ही, सरकार बीएसएनएल को खत्म करने का हर संभव प्रयास कर रही है। सब्सिडियरी टॉवर कंपनी का निर्माण इसी दिशा में की गई एक कोशिश है। पेंशन कॉन्ट्रिब्यूशन के नाम पर बीएसएनएल से प्रचुर राशि ऐंठना, बीएसएनएल को 4G स्पेक्ट्रम के आवंटन में आनाकानी आदि सब कुछ बीएसएनएल को खत्म करने हेतु सरकार द्वारा खेले जा रहे खेल का हिस्सा है।
सेंट्रल ट्रेड यूनियन्स व बीएसएनएल ईयू सहित विभिन्न उद्योगों के स्वतंत्र फेडरेशन सरकार की अमीर समर्थक और गरीब विरोधी नीतियों के खिलाफ निरंतर संघर्ष कर रहे हैं। उनके द्वारा 12 सूत्रीय मांगपत्र में शामिल मुद्दों के निराकरण की मांग की जा रही है। 2015 की एक दिन की आम हड़ताल, 2016 में 2 दिवसीय हड़ताल, 2017 में हुआ महापड़ाव ये सब वे संघर्ष हैं जो मोदी सरकार की कॉर्पोरेट समर्थक और कर्मचारी विरोधी नीतियों के खिलाफ गए हैं। फिर भी, सरकार 12 सूत्रीय मांगपत्र पर विचार करने के मूड में दिखती प्रतीत नही हो रही है।
ऐसी परिस्थितियों में नई दिल्ली में 28.09.2018 को सम्पन्न मजदूर- कर्मचारियों के राष्ट्रीय सम्मेलन ने दो दिवसीय हड़ताल का आव्हान किया है। बीएसएनएल ईयू ने, अपने स्थापना वर्ष 2001 से इन सभी आम हड़तालों में शिरकत की है। बीएसएनएल ईयू की यह सेंट्रल एग्जीक्यूटिव कमेटी मीटिंग नेशनल कन्वेंशन ऑफ वर्कर्स के कॉल का समर्थन करती है। यह मीटिंग बीएसएनएल में हड़ताल की सफलता हेतु सीएचक्यू, सर्किल और डिस्ट्रिक्ट यूनियन्स का पूर्ण गंभीरता के साथ कैंपेन करने का आव्हान करती है।
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